सावन की विदाई और रक्षाबंधन के साथ ही देश में त्योहारों की सरगर्मी बढ़ गई है. लोग आने वाले पर्व-त्योहारों की तैयारियों में जुटे हैं, लेकिन इस बीच रसोई का बजट आम आदमी की चिंता बढ़ा रहा है. एलपीजी गैस के बाद अब सब्जियों और राशन के बढ़ते दाम गृहणियों का गणित बिगाड़ रहे हैं.
प्याज की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार को बफर स्टॉक से आपूर्ति बढ़ानी पड़ रही है और ‘कांदा एक्सप्रेस’ जैसी विशेष मालगाड़ियों के जरिए प्याज बड़े खपत वाले राज्यों में भेजा जा रहा है. प्याज की कीमतों में यह तेजी अचानक बढ़ी मांग के कारण नहीं, बल्कि पुराने स्टॉक के खत्म होने और नई फसल के बाजार में आने के बीच बने सप्लाई गैप (अंतर) की वजह से आई है.
आइए समझते हैं प्याज के दाम में तेजी के 5 मुख्य कारण और अलग-अलग राज्यों में इसके भाव.
प्याज की कीमतें बढ़ने के 5 मुख्य कारण
1-कटाई के दौरान मौसम की मार और सड़न
मार्च और अप्रैल में कटाई के दौरान हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से प्याज की परतों में नमी जमा हो गई. ग्रीष्मकाल और उमस भरे मौसम में भंडारण के दौरान इस नमी से प्याज में फंगस और काला सड़न रोग लग गया, जिससे भंडारण में होने वाला नुकसान सामान्य 25% से बढ़कर 35-40% तक पहुंच गया.
2-उत्पादन का भौगोलिक केंद्रीकरण
देश के कुल प्याज उत्पादन का 50% से 60% हिस्सा केवल तीन राज्यों, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक से आता है. इन प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की देरी या बाढ़ जैसी स्थिति पैदा होते ही देशभर में प्याज की आवक बुरी तरह प्रभावित होती है.
3-फसल चक्र का अंतर और सप्लाई गैप (सितंबर–नवंबर):
खरीफ की नई फसल आने से ठीक पहले हर साल सितंबर से नवंबर के बीच बाजार में आपूर्ति की कमी रहती है. इस दौरान देश पूरी तरह से रबी सीजन के संग्रहित प्याज पर निर्भर होता है. यदि संग्रहित स्टॉक समय से पहले सड़ जाए या समाप्त हो जाए, तो नई आवक तक कीमतें अचानक उछल जाती हैं.
4-बिचौलियों का मार्जिन और जमाखोरी
किसानों से उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच प्याज कई मध्यस्थों और खुदरा विक्रेताओं से गुजरता है. बिचौलिए अक्सर किसानों से कम दाम पर खरीदारी कर लोकल मार्केट में 40% से 70% तक का भारी मार्जिन जोड़ते हैं. इसके अलावा, किल्लत की आहट मिलते ही सट्टेबाजी और अवैध जमाखोरी से खुदरा कीमतों में कृत्रिम तेजी लाई जाती है.
5-भंडारण व लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
अत्यधिक नमी के कारण प्याज को सामान्य कोल्ड स्टोरेज में नहीं रखा जा सकता (वहां इसमें अंकुरण शुरू हो जाता है). अधिकांश किसान आज भी पारंपरिक हवादार बांस के ढांचों (‘कांदा चाल’) पर निर्भर हैं. यह व्यवस्था प्रतिकूल मौसम में फसल की सुरक्षा करने में असमर्थ है, जिससे कटाई के बाद बड़े पैमाने पर नुकसान होता है.
राज्यवार प्याज के खुदरा भाव और अंतर की वजहें
प्याज के दैनिक भाव स्थानीय आवक और आपूर्ति के आधार पर परिवर्तित होते रहते हैं. मुख्य उत्पादक क्षेत्रों (विशेषकर महाराष्ट्र) से दूरी, मालभाड़ा (फ्रेट), स्थानीय कर और आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता के आधार पर राज्यों में कीमतों का अंतर नीचे दिया गया है
| राज्य / केंद्र शासित प्रदेश | औसत खुदरा कीमत (प्रति किलो) | कीमत तय करने वाले मुख्य कारण |
| महाराष्ट्र (मुख्य उत्पादक) | ₹30 – ₹42 | नासिक और लासलगांव जैसी देश की सबसे बड़ी थोक मंडियों के नजदीक होने के कारण सबसे कम दाम. |
| दिल्ली / NCR (बड़ा उपभोक्ता केंद्र) | ₹60 – ₹68 | पश्चिमी भारत से लंबी परिवहन दूरी, मालभाड़ा और शहर भर में फैला लंबा रिटेल नेटवर्क. |
| तमिलनाडु (चेन्नई) (गैर-उत्पादक क्षेत्र) | ₹58 – ₹65 | महाराष्ट्र और कर्नाटक से लंबी दूरी का परिवहन खर्च और दक्षिणी सप्लाई रूट पर निर्भरता. |
| पश्चिम बंगाल (कोलकाता) | ₹55 – ₹65 | पश्चिमी राज्यों से दूरी, परिवहन लागत और पूर्वी भारत की मंडियों में बिचौलियों का मार्जिन. |
| पूर्वोत्तर राज्य (असम व अन्य) | ₹65 – ₹75+ | कठिन भौगोलिक मार्ग, अत्यधिक मालभाड़ा और लॉजिस्टिक्स की अतिरिक्त लागत. |
क्या जल्द ही कम होंगे प्याज के दाम?
प्याज की कीमतों में नरमी मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करेगी कि नई फसल बाजार में कब और कितनी मात्रा में आती है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि प्याज के दाम अभी उच्च स्तर पर बने रह सकते हैं और सितंबर-अक्टूबर के दौरान अपने उच्चतम स्तर (पीक) पर पहुंच सकते हैं. इस अवधि तक रबी फसल का पुराना स्टॉक खत्म होने की उम्मीद है, जबकि खरीफ की नई फसल की आवक में थोड़ी देरी हो सकती है. यही वजह है कि आने वाले हफ्तों में मौसम का मिजाज बेहद निर्णायक होगा.
वहीं इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में प्याज निर्यातक दानिश शाह ने बताया कि सितंबर महीने का मौसम सबसे अहम कारक साबित होगा. यदि बारिश से फसल को नुकसान पहुंचता है तो कीमतें और उछल सकती हैं, जबकि अच्छी गुणवत्ता वाली आवक मिलने पर दामों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.
फिलहाल सरकार के बफर-स्टॉक की पहलों से उन शहरों में तात्कालिक राहत मिल सकती है जहां कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ी हुई हैं. हालांकि, दीर्घकालिक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि नई खरीफ फसल की कुल पैदावार और गुणवत्ता कैसी रहती है.
