फरीदाबाद, (सरूप सिंह)। सीनियर सिटिजन एक्ट के अंतर्गत बुजुर्गों की संपत्ति और भरण-पोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल के कई पुराने फैसलों पर अब सवाल खड़े हो गए हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में सुनाए गए आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल का गठन नियमों के अनुरूप नहीं था।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल एसडीएम और डीसी द्वारा दिए गए फैसले वैध नहीं माने जा सकते, क्योंकि ट्रिब्यूनल में निर्धारित संख्या में सदस्य मौजूद नहीं थे। अदालत ने दोनों मामलों को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया है। पहला मामला राजवंत कौर की ओर से दायर किया गया था। उन्होंने वर्ष 2016 में एसडीएम, मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल फरीदाबाद तथा वर्ष 2017 में डिप्टी कमिश्नर-कम-अपीलीय प्राधिकरण द्वारा दिए गए आदेशों को चुनौती दी थी।
दूसरे मामले में प्रेमवती ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। दोनों मामलों की सुनवाई करते हुए छह मई 2026 को न्यायमूर्ति कुलदीप तिवारी की अदालत ने कहा कि हरियाणा सरकार की अधिसूचना के अनुसार ट्रिब्यूनल में चेयरमैन के साथ दो गैर-सरकारी सदस्यों का होना अनिवार्य था। लेकिन संबंधित मामलों में फैसले अकेले अधिकारियों ने सुनाए, जिससे आदेश कानूनी रूप से अमान्य हो गए।
अदालत ने यह भी माना कि ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल पूर्ण सदस्यीय नहीं थे और नियमों का पालन किए बिना आदेश पारित किए गए। खास बात यह रही कि सरकार की ओर से पेश वकीलों ने भी कोर्ट में स्वीकार किया कि आदेश पूरे कोरम के बिना दिए गए थे। इसके बाद हाई कोर्ट ने दोनों आदेश निरस्त कर दिए। इन फैसलों के बाद अब वर्ष 2016-17 के दौरान सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत दिए गए अन्य आदेशों की वैधता पर भी खतरा मंडराने लगा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अन्य मामलों में भी ट्रिब्यूनल अधूरा था, तो बड़ी संख्या में पुराने आदेश हाई कोर्ट में चुनौती के दायरे में आ सकते हैं। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि जब सरकार की अधिसूचना में ट्रिब्यूनल की संरचना स्पष्ट थी, तो वर्षों तक नियमों के विपरीत व्यवस्था कैसे चलती रही। इस निर्णय का असर उन बुजुर्गों पर भी पड़ सकता है जिन्हें पहले ट्रिब्यूनल से राहत मिल चुकी थी। अब कई मामलों में दोबारा सुनवाई की नौबत आ सकती है, जिससे लोगों को फिर से कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।