फरीदाबाद, (सरूप सिंह)। कुछ विरासतें संपत्ति के रूप में नहीं मिलतीं, बल्कि जिम्मेदारी और संस्कार के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। बड़ौली गांव के अंकित चंदीला भी अपने दादा स्वर्गीय नत्थी सिंह चंदीला से ऐसी ही एक विरासत लेकर आगे बढ़ रहे हैं। दादा जिस तालाब को बचाने के लिए लंबे समय तक आवाज उठाते रहे, अब उसी तालाब को संवारने का बीड़ा उनके पोते ने उठा लिया है।

अंकित चंदीला अपने साथी हल्लू चंदीला के साथ पिछले 17 दिनों से लगातार सुबह-शाम तालाब की सफाई में जुटे हुए हैं। बिना किसी बड़े सरकारी संसाधन या मशीनरी के दोनों अपने स्तर पर तालाब के आसपास जमा गंदगी और कचरे को हटाने का काम कर रहे हैं। ग्रामीणों के बीच लंबे समय से यह मान्यता रही है कि इस तालाब में स्नान करने से चर्म रोग सहित कई बीमारियों में राहत मिलती है।
समय के साथ तालाब पर अतिक्रमण, गंदे पानी की निकासी और जलकुंभी के फैलाव ने इसकी स्थिति खराब कर दी। अंकित के दादा स्वर्गीय नत्थी सिंह चंदीला मंदिर की देखरेख से जुड़े रहे थे। तालाब की लगातार बिगड़ती स्थिति को लेकर उन्होंने कई बार आवाज उठाई और प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों से इसके संरक्षण की मांग की। परिवार की ओर से भी तालाब की सफाई और गंदे पानी की निकासी रोकने के लिए कई बार गुहार लगाई गई, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
आखिरकार अंकित ने तय किया कि केवल शिकायत करने से बेहतर है कि बदलाव की शुरुआत खुद की जाए। इसी सोच के साथ उन्होंने तालाब की सफाई का काम शुरू कर दिया। तालाब के आसपास का काफी हिस्सा अब साफ किया जा चुका है, लेकिन पानी के अंदर फैली जलकुंभी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। सीमित संसाधनों के बावजूद अंकित और हल्लू लगातार इसे निकालने में जुटे हैं।
अंकित का कहना है कि केवल तालाब की सफाई कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि आसपास की नालियों का गंदा पानी लगातार तालाब में आता रहा तो कुछ समय बाद तालाब फिर से गंदगी और जलकुंभी से भर जाएगा। अंकित का कहना है कि पार्षद और प्रशासन के सामने कई बार गंदे पानी की निकासी रोकने की मांग रखी गई, लेकिन अभी तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है।
उनकी मांग है कि तालाब की सफाई के साथ-साथ इसमें आने वाले गंदे पानी को भी रोका जाए और तालाब के संरक्षण के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए।अंकित के लिए यह सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि अपने दादा के अधूरे सपने को पूरा करने की कोशिश है। उनका उद्देश्य है कि बड़ौली का यह पुराना तालाब दोबारा अपने पुराने स्वरूप में लौटे और गांव की आस्था, पर्यावरण और पहचान का हिस्सा बने।
अब अंकित की इस व्यक्तिगत पहल को प्रशासन और ग्रामीणों के सहयोग की जरूरत है। यदि सरकारी स्तर पर गंदे पानी की निकासी और अतिक्रमण की समस्या का समाधान किया जाए, तो बड़ौली का यह तालाब फिर से अपनी खोई हुई पहचान हासिल कर सकता है।
