दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी को ही अवैध बताकर तलाक मांगने वाले एक पति को राहत देने से इनकार कर दिया. पति का दावा था कि वर्ष 2008 में जब उसकी शादी की रस्में हुई थीं तब वो नशीली या बेहोशी की दवा के असर में था. पति ने ये तक दावा किया कि उसकी सहमति से शादी नहीं हुई थी.
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति का यह दावा सही भी माना जाए तो यह शादी को सीधे तौर पर शून्य नहीं बनाता, बल्कि अधिकतम ऐसी स्थिति हो सकती है जिसमें शादी को रद्द कराने की मांग की जा सकती थी. इसके लिए कानून में तय समय सीमा के भीतर कदम उठाना जरूरी था.
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पत्नी ने साथ रहने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि वो शादी के अस्तित्व और वैधता से इनकार नहीं कर सकता, लेकिन शादी को खत्म करने के लिए वो हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक भी मांग सकता है. बता दें कि पति-पत्नी की शादी 20 फरवरी 2008 को आर्य समाज मंदिर में हुई थी. दोनों की कोई संतान नहीं हुई. शादी के कुछ ही समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया.
जून 2008 में पत्नी ने पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत शिकायत की. इसके बाद उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत पति के साथ दोबारा रहने की मांग करते हुए कोर्ट का रुख किया था.
2013 में पत्नी के पक्ष में आया था कोर्ट से फैसला
पत्नी की याचिका पर सितंबर 2013 में कोर्ट ने उसके पक्ष में वैवाहिक अधिकार बहाली ( Restitution of Conjugal Rights ) का आदेश जारी किया था. आसान भाषा में कहें तो कोर्ट ने पति-पत्नी को फिर से साथ रहने का रास्ता दिया था, लेकिन इसके बावजूद दोनों साथ नहीं रहे. इसके बाद साल 2016 में पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल कर दी. उसने दलील दी कि वैवाहिक अधिकार बहाली का आदेश होने के बावजूद दोनों के बीच लंबे समय तक साथ रहना नहीं हुआ इसलिए उसे तलाक दिया जाना चाहिए.
‘पत्नी साथ रहने को तैयार थी, फिर पति ने कोशिश क्यों नहीं की’
मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो पति ने कहा कि पत्नी खुद अलग रह रही थी. उसका तर्क था कि पत्नी के साथ न रहने के कारण वो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A) के तहत तलाक का हकदार है, लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड से साफ है कि पति ने पत्नी के साथ सुलह करने या उसे वापस लाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की. इसके उलट पत्नी उसके साथ रहने और यहां तक कि दोनों के बीच चल रहे मुकदमों को वापस लेने के लिए भी तैयार थी.
पति को ही अलग रहने के लिए जिम्मेदार बताया
हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी ने कोर्ट के आदेश को लागू कराने की कोशिश की, लेकिन पति के साथ रहने से इनकार करने के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका. कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पति ने खुद माना था कि उसने पत्नी को वापस लाने की कोई कोशिश नहीं की. कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पति का अपना आचरण ही उसके खिलाफ जाता है. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 के तहत कोई व्यक्ति अपने ही गलत आचरण का फायदा उठाकर तलाक की मांग नहीं कर सकता.
कोर्ट ने कहा-ऐसा नहीं चलेगा
कोर्ट ने पति के रुख को खास तौर पर विरोधाभासी बताया. कोर्ट ने कहा कि पति एक तरफ कहता है कि उसकी शादी वैध ही नहीं थी और दूसरी तरफ उसी शादी को खत्म करने के लिए तलाक की मांग कर रहा था. कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में कोई व्यक्ति एक साथ दो विपरीत रुख नहीं अपना सकता. अगर वह शादी के अस्तित्व को ही नकार रहा है तो उसी शादी के आधार पर तलाक की मांग नहीं कर सकता. कोर्ट ने इसे ‘approbate and reprobate’ यानी एक ही समय में दो विरोधी स्टैंड लेने की स्थिति बताया.
शादी के समय नशीली दवा के असर की दलील से राहत नहीं
पति ने यह भी दावा किया था कि शादी के समय वो नशीली दवा के असर में था और उसकी सहमति सही तरीके से नहीं ली गई. हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की दलील, अधिकतम हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के दायरे में आ सकती है, जहां धोखे या जबरदस्ती से मिली सहमति जैसी परिस्थितियों में शादी को रद्द कराने की मांग की जा सकती है, लेकिन ऐसी याचिका के लिए कानून में समय सीमा तय है. कोर्ट ने कहा कि पति ने शादी की वैधता पर आपत्ति बाद में उठाई और इस संबंध में पहले ही कार्यवाही हो चुकी थी जो उसके खिलाफ अंतिम रूप ले चुकी थी.
हर महीने 10 हजार रुपये देने का तर्क भी नहीं आया काम
पति ने कोर्ट के सामने यह भी कहा कि वह पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे रहा है. हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि केवल गुजारा भत्ता देना तलाक पाने का आधार नहीं बन जाता. कोर्ट ने कहा कि पत्नी को भत्ता देना कानून के तहत पति की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन इससे अपने आप तलाक का अधिकार पैदा नहीं होता.
फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं मिली
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के फैसले में न तो कोई कानूनी गलती है और न ही ऐसा कुछ है जिसे गलत या मनमाना कहा जा सके. पति ने खुद पत्नी के साथ रहने की कोशिश नहीं की और फिर उसी आधार पर तलाक मांगना शुरू कर दिया. इन्हीं आधारों पर जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने पति की अपील खारिज कर दी.
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