फरीदाबाद, (सरूप सिंह)। जहाँ लोग चोरी या कोई और गुनहा करके, बिबा स्वीकार किये सैलून तक कोर्ट में केस लड़ते हैं वहीँ करीब तीन दशक पुराने चोरी के एक मामले में आरोपी ने कोर्ट में अपना गुनहा मान लिया और इस तरह एक चोरी के मुक़दमे का नाटकीय ढंग से अंत हो गया। तीस साल पुराने जिला अदालत में लंबित इस केस में न तो कोई गवाह बचा, न ही कोई ठोस सबूत पेश हो पाया।

ऐसे में आरोपी ने खुद ही अपना जुर्म स्वीकार कर लिया, जिसके बाद अदालत ने उसे दोषी करार देते हुए 19 दिन की न्यायिक हिरासत को ही पर्याप्त सजा मान लिया। यह मामला 18 सितंबर 1996 को ओल्ड फरीदाबाद थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ था। गांव फरीदपुर निवासी सुभाष चंद ने शिकायत दी थी कि 17 सितंबर की रात उनके खेत में बने कोठरे से ट्यूबवेल की मोटर चोरी हो गई। पुलिस ने जांच के दौरान हीरालाल नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया।
जिसने पूछताछ में बताया कि उसने चोरी की मोटर विजय उर्फ बिजेंद्र को बेच दी थी। इसके बाद 5 नवंबर 1996 को पुलिस ने विजय उर्फ बिजेंद्र को भी गिरफ्तार कर लिया और उसके पास से चोरी की मोटर बरामद कर ली। हालांकि अगले ही दिन उसे जमानत मिल गई। 26 नवंबर 1996 को पुलिस ने हीरालाल पर चोरी और बिजेंद्र पर चोरी का सामान रखने की धारा आईपीसी 411 के तहत अदालत में चालान पेश कर दिया।
मुकदमे के दौरान हीरालाल की मौत हो गई, जबकि बिजेंद्र 2005 में अदालत में पेश नहीं हुआ और उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया। इसके बाद मामला वर्षों तक फाइलों में दबा रहा। न पुलिस ने इस पर विशेष ध्यान दिया और न ही आरोपी ने इसे गंभीरता से लिया। दिसंबर 2025 में पुराने भगोड़ा आरोपियों की तलाश के लिए चलाए गए अभियान के दौरान पुलिस ने 22 दिसंबर को बिजेंद्र को गिरफ्तार कर लिया।
उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 7 जनवरी 2026 को उसे जमानत मिल गई और फिर मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान सामने आया कि न तो शिकायतकर्ता जीवित है, न जांच अधिकारी और न ही मुख्य आरोपी। ऐसे में कोई गवाह या सबूत बचा ही नहीं था। इस स्थिति में बिजेंद्र ने अदालत के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी उपेंद्र सिंह ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए उसे पहले ही काटी गई 19 दिन की न्यायिक हिरासत को सजा मान लिया। इसी के साथ जिला अदालत में लंबित सबसे पुराने आपराधिक मामलों में से एक का अंत हो गया।