फरीदाबाद, (सरूप सिंह)। शहर में रसोई गैस की भारी किल्लत ने आम लोगों की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई परिवार अब मजबूरी में पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने लगे हैं। गैस की कमी का सीधा असर ईंधन बाजार पर पड़ा है, जिससे लकड़ी और कोयले की मांग अचानक बढ़ गई है और उनके दाम भी तेजी से ऊपर चले गए हैं।

पहले जो लकड़ी करीब ₹10 प्रति किलो के आसपास मिल जाती थी, अब वही ₹13 से ₹18 प्रति किलो तक पहुंच गई है। गैस सिलिंडर आसानी से उपलब्ध न होने के कारण लोग बड़ी संख्या में लकड़ी और कोयला खरीदने के लिए टाल (लकड़ी बाजार) का रुख कर रहे हैं। खासकर वे परिवार ज्यादा परेशान हैं जिनके पास गैस कनेक्शन नहीं है और जिनका पहले किसी तरह सिलिंडर खरीदकर काम चल जाता था।
कमर्शियल गैस की कमी का असर छोटे कारोबारियों पर भी साफ दिख रहा है। होटल, ढाबे और फास्ट फूड विक्रेता अब कोयले की भट्टी पर निर्भर हो गए हैं। सेक्टर-23 के एक फास्ट फूड विक्रेता ने बताया कि गैस न मिलने की वजह से दुकान बंद करने की नौबत आ गई थी, लेकिन उन्होंने कोयले की भट्टी लगाकर काम जारी रखा है। घरेलू स्तर पर भी लोगों की परेशानी बढ़ती जा रही है।
एनआईटी क्षेत्र की निवासी रीटा देवी का कहना है कि पहले वे ₹10 प्रति किलो लकड़ी खरीदती थीं, लेकिन अब उन्हें ₹18 प्रति किलो तक खर्च करना पड़ रहा है। गैस सिलिंडर नहीं मिलने से उन्हें मजबूरन चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। वहीं काजल नामक महिला ने बताया कि उनके पास गैस कनेक्शन नहीं है और वे छोटे सिलिंडर से काम चलाती थीं। पहले गैस ₹100 प्रति किलो के हिसाब से मिल जाती थी, लेकिन बाद में इसकी कीमत ₹400 तक पहुंच गई।
अब हालात ऐसे हैं कि उन्हें लकड़ी के चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है, जबकि लकड़ी भी महंगी हो चुकी है। कोयला विक्रेताओं के अनुसार, गैस संकट के चलते ईंधन की मांग में अचानक उछाल आया है। एनएच-5 क्षेत्र के एक विक्रेता ने बताया कि पहले जो लकड़ी ₹10-11 प्रति किलो बिकती थी, वह अब ₹13-18 तक पहुंच गई है। वहीं पक्का कोयला ₹20-22 से बढ़कर ₹25 प्रति किलो और कच्चा कोयला ₹38-40 से बढ़कर ₹50 प्रति किलो तक बिक रहा है।
कुल मिलाकर गैस की कमी ने शहर में एक नई समस्या खड़ी कर दी है, जहां लोग महंगे विकल्प अपनाने को मजबूर हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह संकट और भी गंभीर होता जा रहा है, जिससे राहत के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग भी उठने लगी है।