कर्नाटक के अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री बी. नागेंद्र ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. ‘कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम’ (KMVSTDC) में कथित तौर पर ₹89.63 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विपक्षी दलों (भाजपा और जेडीएस) के भारी दबाव के बाद उन्होंने यह कदम उठाया. हालांकि, इस्तीफा सौंपते समय नागेंद्र ने खुद को बेकसूर बताते हुए कहा कि उन पर लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं और किसी भी लेनदेन पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं.
क्या है वाल्मीकि कॉर्पोरेशन घोटाला?
वाल्मीकि कॉर्पोरेशन घोटाला कर्नाटक का एक बड़ा वित्तीय घोटाला है. इसमें ‘कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम’ के कुल ₹187 करोड़ के फंड में से ₹89.63 करोड़ को कथित तौर पर अवैध रूप से डायवर्ट और हड़पने का मामला शामिल है.
यह फंड विशेष रूप से राज्य के आदिवासी (ST) समुदाय के कल्याण और विकास कार्यों के लिए आवंटित किया गया था. आरोप हैं कि इस पैसे को कल्याणकारी योजनाओं में लगाने के बजाय सैकड़ों शेल कंपनियों (फर्जी खातों), आईटी फर्मों और एक कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी के खातों के जरिए अवैध रूप से घुमाया गया.
कैसे हुआ घोटाले का पर्दाफाश?
इस बहुचर्चित घोटाले का खुलासा तब हुआ जब निगम के अकाउंट्स सुपरिटेंडेंट 52 वर्षीय चंद्रशेखरन पी ने दुखद रूप से आत्महत्या कर ली. उन्होंने एक विस्तृत सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें शीर्ष प्रबंधन और अधिकारियों के जबरदस्त दबाव में बिना मंजूरी अवैध ट्रांसफर करने की बात उजागर हुई थी.
जांच से पता चला कि निगम के ‘यूनियन बैंक ऑफ इंडिया’ (एमजी रोड शाखा) के आधिकारिक खाते से लगभग ₹88.62 करोड़ अनधिकृत खातों में भेजे गए. फर्जी चेक, RTGS और ऑनलाइन सिस्टम का उपयोग करके यह राशि हैदराबाद की ‘फर्स्ट फाइनेंस क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी’ सहित 600 से अधिक अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई और बाद में इसे नकद निकाल लिया गया.
ED का खुलासा: बी. नागेंद्र ही हैं मुख्य ‘मास्टरमाइंड’
मामले की जांच कर रही राज्य की एसआईटी (SIT) के साथ केंद्रीय एजेंसियां भी सक्रिय हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र को इस पूरे मनी लॉन्ड्रिंग खेल का मुख्य “मास्टरमाइंड” और साजिशकर्ता करार दिया है.
ED के अनुसार
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नागेंद्र ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करके बिना किसी अनुमति के निगम का बैंक खाता बेंगलुरु की एक विशेष शाखा में ट्रांसफर करवाया.
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उन्होंने अपने निजी स्टाफ, सहयोगियों और निजी कंपनियों की मदद से ₹89.63 करोड़ के डायवर्जन की साजिश रची.
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केंद्रीय एजेंसी के दस्तावेजों के मुताबिक, हेराफेरी की गई राशि में से लगभग ₹20 करोड़ का इस्तेमाल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक अभियानों के वित्तपोषण के लिए किया गया था.
राजनीतिक असर और इस्तीफा
इस घोटाले के सामने आने के बाद राज्य में बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया. विपक्षी दल भाजपा और जेडीएस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सीबीआई जांच व मंत्री के इस्तीफे की मांग की. बीजेपी द्वारा रायचूर से बेल्लारी तक निकाली जाने वाली 10-दिवसीय पदयात्रा से ठीक पहले बी. नागेंद्र ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
इस्तीफा देने के बाद नागेंद्र ने कहा, “मुझे राजनीतिक साजिश के तहत निशाना बनाया जा रहा है. जांच में सच सामने आएगा और मेरी बेगुनाही साबित होगी.”
घोटाले की गहराई और बदलता राजनीतिक परिदृश्य
वाल्मीकि कॉर्पोरेशन घोटाला न केवल प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर जारी सार्वजनिक धन का किस प्रकार दुरुपयोग किया जा सकता है. आदिवासी समुदाय के उत्थान और विकास के लिए सुरक्षित रखी गई ₹89.63 करोड़ की भारी-भरकम राशि का निजी लाभ और राजनीतिक अभियानों के लिए इस्तेमाल होना बेहद चिंताजनक है. इस घटनाक्रम ने कर्नाटक सरकार की छवि पर गहरा असर डाला है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.
विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ एक प्रमुख मुद्दा बनाकर राज्यव्यापी प्रदर्शनों के जरिए घेराबंदी तेज कर रहा है. मामले में एसआईटी और प्रवर्तन निदेशालय की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, फर्जी खातों के जाल और धन के लेन-देन से जुड़ी कई चौंकाने वाली परतें खुलने की उम्मीद है. यदि जांच एजेंसियां स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से ठोस सबूत जुटाने में सफल रहती हैं, तो यह मामला न केवल बी. नागेंद्र के राजनीतिक भविष्य का फैसला करेगा, बल्कि राज्य की राजनीति में दीर्घकालिक असर भी डालेगा.
