Xप्लेन: नेपाल में ग्लेशियर ब्लास्ट का अलर्ट, सीमा पार मंडराते ‘जल प्रलय’ से निपटने को भारत कितना तैयार?


नेपाल से सटे हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर टूटने और हिमनद झील फटने की घटनाओं ने सभी को चिंतित कर दिया है. हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में अचानक होने वाले ये बदलाव पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए एक गंभीर मानवीय और प्राकृतिक आपदा का रूप ले रहे हैं. चूंकि नेपाल से निकलने वाली प्रमुख नदियां सीधे भारत के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं, इसलिए वहां आने वाली कोई भी फ्लैश फ्लड भारत के सीमावर्ती राज्यों विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम में भारी तबाही मचाने की क्षमता रखती हैं. इस अभूतपूर्व प्राकृतिक संकट के बीच भारत की वर्तमान तैयारियों, तकनीकी क्षमताओं, प्रशासनिक प्रतिक्रिया और मौजूदा कमजोरियों का मूल्यांकन 7 प्रमुख बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता है.

भारत की तैयारियों का मूल्यांकन

1. NDMA का राष्ट्रीय GLOF मिशन और जोखिम प्रबंधन

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने हिमालयी राज्यों (जैसे सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश) में स्थित खतरनाक हिमनद झीलों का मानचित्रण कर 56 से अधिक अत्यधिक संवेदनशील झीलों को चिह्नित किया है. इन झीलों में पानी की अधिकता से होने वाले दबाव को कम करने के लिए ‘लेक-साइफनिंग’ (Lake-Siphoning) और नियंत्रित जल निकासी के पायलट प्रोजेक्ट संचालित किए जा रहे हैं, ताकि अचानक झील फटने की स्थिति को रोका जा सके.

2. अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) का विस्तार और सीमाएं

भारत ने संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में स्वचालित मौसम स्टेशन (AWS), जलस्तर मापने वाले सेंसर और अर्ली वार्निंग अलार्म स्थापित करने की गति तेज की है. इसके बावजूद, नेपाल या तिब्बत जैसे ट्रांस-बाउंड्री क्षेत्रों से रीयल-टाइम डेटा समय पर न मिलने के कारण चेतावनी जारी करने की अवधि (Lead Time) काफी कम हो जाती है, जो कि निचले क्षेत्रों को समय रहते खाली कराने में एक बड़ी बाधा है.

3. ISRO और CWC द्वारा उन्नत सैटेलाइट निगरानी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर और नई बन रही हिमनद झीलों के आकार पर निरंतर नजर रख रहे हैं. सैटेलाइट आधारित यह मैपिंग संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का पूर्वानुमान लगाने और आपातकालीन योजनाएं बनाने में बेहद मददगार साबित हो रही है.

4. NDRF और SDRF का त्वरित और सक्षम रिस्पॉन्स नेटवर्क

उत्तराखंड की चमोली आपदा (2021) और सिक्किम में आई फ्लैश फ्लड (2023) से सबक लेते हुए, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य स्तरीय बलों (SDRF) की कार्यप्रणाली को अत्यधिक आधुनिक बनाया गया है. इन टीमों को ‘हाई-ऑल्टीट्यूड रेस्क्यू’ उपकरणों, उपग्रह संचार प्रणालियों और ड्रोन तकनीक से लैस किया गया है, ताकि कठिन दुर्गम इलाकों में भी तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू किया जा सके.

5. सीमा पार सहयोग और रीयल-टाइम डेटा साझाकरण में कमी

नेपाल और चीन, तिब्बत क्षेत्र से निकलने वाली कोसी, गंडक, घाघरा और त्रिशूली जैसी नदियां भारत में बहती हैं. हालांकि इन देशों के साथ द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं, लेकिन आपातकालीन स्थितियों में तत्काल ‘रीयल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल और मीटीरोलॉजिकल डेटा’ का स्वतः आदान-प्रदान अभी भी बेहद सीमित है. एक एकीकृत सीमा-पार पूर्व चेतावनी नेटवर्क का अभाव भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है.

6. बुनियादी ढांचे और हाइड्रो-प्रोजेक्ट्स की संवेदनशीलता

हिमालयी नदियों पर बने बांध, सुरंगे और जलविद्युत परियोजनाएं ऐसी तीव्र बाढ़ के प्रति बेहद संवेदनशील हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण, सड़कों का चौड़ीकरण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में ‘क्लाइमेट-रेसिलिएंट’ (जलवायु-अनुकूल) इंजीनियरिंग मानकों का पूरी तरह पालन न होना आपदा के प्रभाव और विनाश को कई गुना बढ़ा देता है.

7. समुदाय-आधारित आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया समय

निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को जागरूक करने के लिए मॉक ड्रिल, स्थानीय आपदा मित्रों की नियुक्ति और आपातकालीन निकासी मार्गों का सीमांकन किया गया है. हालांकि, ग्लेशियर टूटने से आने वाली फ्लैश फ्लड, जो मात्र 10 से 15 मिनट में जलस्तर को 5 से 10 मीटर तक बढ़ा देती हैं, से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया समय को और कम करने की सख्त आवश्यकता है.

भारत ने नीतिगत सुधारों, उपग्रह तकनीक के उपयोग और आपदा प्रबंधन बलों की तत्परता के स्तर पर महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है. हालांकि, ग्लेशियरों के अचानक ढहने और ट्रांस-बाउंड्री फ्लैश फ्लड की अनिश्चित प्रकृति को देखते हुए तैयारियों को पूरी तरह से अचूक नहीं माना जा सकता.

जब तक नेपाल और चीन के साथ एक पारदर्शी और त्वरित रीयल-टाइम डेटा साझाकरण ढांचा तैयार नहीं होता और हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ निर्माण नीतियां लागू नहीं की जातीं, तब तक भारत के मैदानी राज्यों पर यह गंभीर खतरा बना रहेगा.



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Prime Haryana
Author: Prime Haryana

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