Xप्लेन: आंदोलन के आगे क्यों झुक रही हैं सरकारें? झारखंड से दिल्ली तक पूरा समीकरण


पिछले कुछ हफ्तों में भारत की राजनीति में एक साफ पैटर्न दिखा है- एक के बाद एक आंदोलन और एक के बाद एक सरकार की ओर से रियायतें. पहले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के छात्र आंदोलन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा दिया. फिर मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन के सामने मोहन यादव सरकार ने घुटने टेक दिए. झारखंड में 24 दिन के आंदोलन और 16 दिनों की भूख हड़ताल के बाद हेमंत सोरेन सरकार को JSSC-CGL समेत आधा दर्जन से ज्यादा परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं. महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल की भूख हड़ताल के बाद सरकार ने उनकी सभी मांगें मान लीं. सवाल यह है कि क्या सच में सरकारें आंदोलनों से डर गई हैं या फिर कोई नई स्ट्रैटजी है…

झारखंड की कहानी: 16 दिन की लड़ाई और बड़ी जीत

यह मामला 2 जुलाई 2026 को शुरू हुआ था. झारखंड के छात्रों ने JSSC-CGL परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन शुरू किया. धीरे-धीरे यह आंदोलन थमने के बजाय और तेज होता गया. देवेंद्र नाथ महतो, उम्मे हबीबा और राहुल क्रांति जैसे छात्र नेता अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए. छात्रों की मांगें थीं:

  • JSSC-CGL परीक्षा को रद्द किया जाए
  • TSR डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) से कराई गई सभी परीक्षाओं को रद्द किया जाए
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता लाई जाए
  • भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो
  • 16 दिनों तक महतो ने रांची के सदर अस्पताल में भूख हड़ताल जारी रखी.

महतो की हालत बिगड़ने लगी, लेकिन वे डटे रहे. आखिरकार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक विशेष कैबिनेट बैठक बुलाई. CM सोरेन ने:

  • JSSC-CGL परीक्षा पूरी तरह रद्द
  • TDPL से कराई गई सभी परीक्षाएं और उनके नतीजे रद्द
  • 2014 से अब तक की सभी परीक्षाओं की CID से जांच
  • 14वीं JPSC परीक्षा और बकाया परीक्षाएं भी रद्द
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) को वित्तीय गड़बड़ी की जांच के लिए लिखा जाएगा

महतो ने इसे ‘झारखंड के लिए बड़ी जीत’ करार दिया. महतो ने कहा, ‘सरकार ने इतना बड़ा कदम उठाने का साहस दिखाया कि एक परीक्षा को रद्द करना आसान काम नहीं था, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया ज्वाइनिंग स्टेज तक पहुंच चुकी थी.’

हालांकि, सभी छात्र संतुष्ट नहीं हैं. कुछ का कहना है कि CBI जांच की मांग अभी बाकी है. एक छात्र नेता पियूष कुमार ने कहा, ‘यह सिर्फ पहला कदम है, CBI जांच अभी लंबित है.’

CJP आंदोलन: 36 दिन, एक इस्तीफा और बड़ी जीत

NEET-UG 2026 की मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम में पेपर लीक के आरोपों ने देशभर में हड़कंच मचा दिया. इसका 23 लाख से ज्यादा छात्रों पर असर पड़ा. कई छात्रों ने इस दबाव में आकर आत्महत्या कर ली. यह मामला इतना बड़ा था कि इसने पूरे देश में युवाओं में आक्रोश फैला दिया.

सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक मजाकिया पार्टी बनाई गई. 20 जुलाई 2026 को हजारों युवा नई दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने निकले. छात्रों की मांगें थीं:

  • शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
  • NEET पेपर लीक की CBI जांच
  • प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR वापस
  • आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए 5-सूत्रीय चार्टर

36 दिनों के बाद केंद्र सरकार ने सभी मांगें मान लीं. केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने खुद कहा कि सरकार ने सभी मांगों पर विचार किया और उन्हें स्वीकार कर लिया. शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. यह मोदी सरकार के लिए एक बड़ी पीछे हटने की घटना मानी गई. आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को नियमानुसार अधिकतम मुआवजा और परीक्षा सुधारों पर 5-सूत्रीय चार्टर पर ‘गहन विचार’ करने का वादा किया.

CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा, ‘हमारी सभी मांगें मान ली गई हैं, इसलिए हम प्रदर्शनकारियों से तुरंत वापस लौटने की अपील करते हैं.’ 36 दिनों के आंदोलन के बाद CJP ने जंतर-मंतर से अपना प्रदर्शन वापस ले लिया.

मध्य प्रदेश किसान आंदोलन: भोपाल में सरकार झुकी

मध्य प्रदेश के किसानों ने मूंग (हरी मूंग) की खरीद को लेकर भोपाल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए. किसानों की मांग थी कि सरकार 25% की मौजूदा सीमा से खरीद बढ़ाए. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मूंग की खरीद सीमा 25% से बढ़ाकर 60% कर दी. खरीद की अंतिम तिथि बढ़ाई औऱ उर्वरक ई-टोकन सिस्टम को निलंबित किया. CM मोहन ने किसानों से बातचीत के लिए एक समिति बनाई.

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और किसान कर्ज माफी

मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटील ने 30 मई 2026 को जालना के अंतरवाली सराटी में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. देर रात महाराष्ट्र सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के बाद 12 सूत्रीय प्रस्ताव पर सहमति बनी और करीब 15 घंटे बाद जरांगे ने अपना उपोषण स्थगित कर दिया.

सरकार ने प्रमुख रूप से:

  • पहले से पहचाने गए 58 लाख कुणबी रिकॉर्ड के आधार पर नियमानुसार कुणबी जाति प्रमाणपत्र जारी करने पर सहमति जताई.
  • कुणबी रिकॉर्ड को ग्राम पंचायत कार्यालयों में उपलब्ध कराने और प्रक्रिया की निगरानी की बात कही.
  • कास्ट वैलिडिटी प्रमाणपत्र जारी करने की प्रगति की हर 15 दिन में समीक्षा का आश्वासन दिया.
  • मराठा आरक्षण आंदोलन के दौरान जान गंवाने वालों के परिवारों को 15 दिनों के भीतर वित्तीय सहायता देने की बात कही.

राजस्थान में ग्रेड-III शिक्षकों का तबादला आंदोलन

राजस्थान में ग्रेड-III शिक्षकों के तबादले का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय बना रहा. शिक्षकों का कहना था कि उन्हें कई सालों से अंतर-जिला तबादलों का इंतजार है. फरवरी 2026 तक यह मुद्दा राजस्थान विधानसभा में भी जोरदार तरीके से उठा.

13-14 फरवरी 2026 को विधानसभा में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच ग्रेड-III शिक्षकों के तबादलों को लेकर तीखी बहस हुई. सरकार ने स्पष्ट किया कि मौजूदा नियमों में ग्रेड-III शिक्षकों के अंतर-जिला तबादले का प्रावधान नहीं है और सरकार नई व्यापक तबादला नीति तैयार कर रही है.

मदन दिलावर ने कहा कि नई तबादला नीति तैयार होने और अंतिम रूप लेने के बाद ही ग्रेड-III शिक्षकों के तबादलों पर निर्णय लिया जाएगा. जुलाई 2026 में राजस्थान शिक्षा विभाग ने दूसरे स्तर के शिक्षकों समेत विभिन्न शिक्षकों के तबादला आदेश जारी किए, लेकिन इसे ग्रेड-III शिक्षकों की मांग पूरी होने के बराबर नहीं माना जा सकता.

किसान दिल्ली मार्च यानी MSP की लड़ाई जारी

17 अगस्त 2026 को पंजाब के किसान संगठनों के दिल्ली कूच की तैयारी के बीच हरियाणा पुलिस ने खनौरी बॉर्डर को सील कर वहां कंक्रीट के बैरिकेड लगा दिए. किसान दिल्ली की ओर मार्च करना चाहते थे. किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं.

किसानों की प्रमुख मांगों में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी, किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार और कृषि से जुड़े अन्य मुद्दे शामिल हैं. 17 अगस्त को हरियाणा में पुलिस की ओर से रास्ता रोकने की कार्रवाई के बाद खनौरी बॉर्डर पर तनाव की स्थिति बनी.

तो आंदोलनों के आगे सरकारें क्यों झुक रही हैं?

सरकारों के पीछे हटने की यह लहर कोई इत्तेफाक नहीं है. यह एक सोची-समझी रणनीति है, जिसके पीछे पांच बड़ी वजहें काम कर रही हैं.

1.’डर खत्म हो गया’: Gen Z के मंत्र ने हिला दी सरकार

CJP आंदोलन के दौरान 20 जुलाई 2026 का ‘चलो संसद’ मार्च गेम-चेंजर साबित हुआ. पुलिस की लाठीचार्ज का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और फिर जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया. प्रदर्शनकारियों ने एक के बाद एक वही बात दोहराई- ‘डर खत्म हो गया.’ पोस्टर्स और नारों में अब शिक्षा मंत्री की जगह प्रधानमंत्री का नाम आने लगा. यह बदलाव केंद्रीय दिल्ली में हो रहा था, जो देश की राजनीतिक ताकत का केंद्र है. वहां पुलिस को चुनौती देना, सीधे प्रधानमंत्री को चुनौती देना था.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘इन युवाओं ने साबित कर दिया कि अगर बहादुरी से खड़े हों तो सफलता मिल सकती है. उन्होंने डर की बाधा को तोड़ दिया है.’ जब आंदोलनकारियों ने डर छोड़ दिया, तो सरकार के पास झुकने के अलावा कोई चारा नहीं बचा.

2. 25 साल की ‘ब्रांड मोदी’ को सबसे बड़ा झटका

PM मोदी की जीवनी लिखने वाले विश्लेषक निलांजन मुखोपाध्याय ने साफ कहा है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ‘ब्रांड मोदी’ के लिए सबसे बड़ा झटका है. उन्होंने कहा, ’25 साल से बनाए गए ब्रांड को अब बड़ा नुकसान पहुंचा है.’

यह कोई आम बात नहीं है. 75 साल के मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से शायद ही कभी सड़क के दबाव में पीछे हटने का फैसला किया हो. मुखोपाध्याय ने इसे ‘मोदी ब्रांड’ पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बताया.

3. सोशल मीडिया का पलड़ा: BJP से दोगुना फॉलोअर्स

सरकार न सिर्फ सड़क पर, बल्कि ऑनलाइन भी पीछे पड़ गई. CJP के इंस्टाग्राम अकाउंट ने महज कुछ हफ्तों में लगभग 2.27 करोड़ फॉलोअर्स जुटा लिए. वहीं, BJP के 96 लाख फॉलोअर्स थे. यानी CJP के फॉलोअर्स BJP से दोगुने से भी ज्यादा थे.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस आंदोलन ने खुलासा कर दिया कि डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से बदल रहा है. BJP अब ऑनलाइन माहौल पर पहले जैसा दबदबा नहीं रखती. BJP इंस्टाग्राम और X पर ढेर सारे शॉर्ट वीडियो और मीम्स की बाढ़ झेल रही थी. खुद PM मोदी को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और उन्होंने सीधे सेल्फी वीडियो जारी किए, लेकिन उनका भी मजाक उड़ाया गया.

4. ‘जिद्द पर अड़े रहने’ की कीमत बहुत ज्यादा थी

सरकार ने यह तौल लिया कि आंदोलन को बढ़ने देने की तुलना में झुक जाना ज्यादा फायदेमंद है. जैसे-जैसे विरोध का दायरा बढ़ता गया, सरकार को लगा कि ‘जिद्द पर अड़े रहने’ की राजनीतिक कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है. सरकार को लगा कि अनसुलझा गतिरोध और फैल सकता है और उसके वोटरों के बीच उसका समर्थन खत्म हो सकता है. इस वजह से उसने पीछे हटकर नुकसान को कंट्रोल करना चुना.

5. 2027 के बड़े चुनावों का दबाव

आंदोलनों का समय भी अहम है. 2027 में पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश समेत 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. इन तीन बड़े राज्यों में BJP की स्थिति अलग-अलग है, लेकिन किसी भी सरकार के लिए चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर युवा और किसान असंतोष पालना खतरनाक होता है.

वहीं विपक्ष के लिए यह सरकार पर दबाव बनाने का सुनहरा मौका था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद झारखंड के CM को पत्र लिखा और CJP आंदोलन को अपना समर्थन दिया.



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Prime Haryana
Author: Prime Haryana

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