फरीदाबाद, (सरूप सिंह)। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पिछले 10 वर्षों में 932 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने के बावजूद शहर को अपेक्षित रूप से “स्मार्ट” नहीं बनाया जा सका। कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अब भी अधूरी हैं, जबकि जो पूरी हो चुकी हैं, उनकी स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। अब मिशन का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और नए काम बंद हो चुके हैं, जिससे पूरे प्रोजेक्ट की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

फरीदाबाद स्मार्ट सिटी कंपनी का गठन 20 सितंबर 2016 को हुआ था। शुरुआत में उम्मीद थी कि शहर के चयनित क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाओं का विकास होगा। कुल 44 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई और धीरे-धीरे उनका कार्य शुरू हुआ, लेकिन क्रियान्वयन के दौरान लगातार खामियां सामने आती रहीं। समय के साथ कई परियोजनाएं या तो अधूरी रह गईं या अपेक्षित गुणवत्ता के साथ पूरी नहीं हो सकीं।
सबसे प्रमुख उदाहरण बड़खल झील परियोजना है, जिस पर लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पिछले छह वर्षों से इस पर काम चल रहा है, लेकिन अब तक यह पूरी नहीं हो सकी है और कई जरूरी कार्य अभी बाकी हैं। इसी तरह ऐतिहासिक बराही तालाब के सौंदर्यीकरण के लिए करीब 10 करोड़ रुपये की योजना बनाई गई थी, लेकिन आठ साल बाद भी यह कार्य अधूरा है और अब इसे एफएमडीए को सौंप दिया गया है।
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत स्लम क्षेत्रों को भी विकसित करने की योजना थी। संत नगर क्षेत्र में करीब आठ साल पहले इस दिशा में काम शुरू किया गया था, लेकिन पांच साल बाद भी यह प्रोजेक्ट अधूरा ही है। अधूरे कार्यों के कारण यहां रहने वाले सैकड़ों परिवारों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अब इस परियोजना को पूरा करने की जिम्मेदारी नगर निगम को दे दी गई है।
दिलचस्प बात यह है कि स्मार्ट सिटी लिमिटेड का खुद का कोई स्थायी कार्यालय तक नहीं बन पाया। फिलहाल इसका संचालन सेक्टर-20ए में एक किराए के भवन से किया जा रहा है, जहां कमांड एंड कंट्रोल रूम भी स्थापित है। वहीं, दो करोड़ रुपये की लागत से बनाए गए स्मार्ट शौचालय भी कुछ ही समय में खराब हो गए और अब उन्हें नगर निगम को सौंप दिया गया है, जिससे योजना की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं।
शहर की पहली स्मार्ट रोड के रूप में विकसित की गई बड़खल रोड, जिस पर करीब 42 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, अब जर्जर हालत में पहुंच चुकी है। सड़क की सीमेंटेड परत टूट रही है, तिरंगा लाइटें गायब हो चुकी हैं और फुटपाथ भी कई जगहों पर तोड़ दिया गया है, जिससे इसकी “स्मार्ट” पहचान फीकी पड़ गई है।
इसके अलावा, कई अन्य परियोजनाएं भी अब नगर निगम के हवाले कर दी गई हैं, जिनमें 325 करोड़ रुपये की लागत से बनी सड़कें, 3.42 करोड़ रुपये के स्मार्ट पार्क, 22.40 करोड़ का वाटर स्काडा सिस्टम, 3.72 करोड़ की मेट्रो पिलर पेंटिंग, 50 लाख की दीवारों पर चित्रकारी, 50 करोड़ की मशीनरी और 40 करोड़ का एसटीपी शामिल हैं। इससे साफ है कि अधिकांश प्रोजेक्ट अब अन्य एजेंसियों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।
स्मार्ट सिटी मिशन के अधिकारियों का कहना है कि परियोजनाओं को पूरा करने में विभिन्न प्रकार की अड़चनें सामने आईं, जिन्हें धीरे-धीरे दूर किया गया, इसी कारण समय अधिक लगा। उनका दावा है कि बची हुई परियोजनाएं भी इसी वर्ष पूरी कर ली जाएंगी।
वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने भी स्वीकार किया है कि स्मार्ट सिटी मिशन के कई कार्यों पर सवाल उठे हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है और जिला विकास एवं निगरानी समिति की बैठक में सभी परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।