बस्ती जिले के हर्रैया कस्बे में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर कौमी एकता, भाईचारे और इंसानियत की एक बेहद अनूठी और भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है. बभनान चौराहे पर आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान राजनीति की तमाम बंदिशों और सीमाओं को दरकिनार करते हुए रिश्तों का पवित्र रंग सिर चढ़कर बोला. बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व कैबिनेट मंत्री राज किशोर सिंह और पूर्व राज्य मंत्री बृजकिशोर सिंह डिम्पल ने क्षेत्र की हजारों गरीब और जरूरतमंद बहनों के साथ मिलकर यह त्योहार अत्यंत धूमधाम से मनाया.
हर्रैया में रक्षाबंधन का यह आयोजन कोई नया सिलसिला नहीं है, बल्कि राजकिशोर एंड ब्रदर्स बीते 25 सालों से लगातार इस परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं. इस वर्ष भी बभनान चौराहे पर भोर से ही बहनों का जुटना शुरू हो गया था. देखते ही देखते पूरा प्रांगण हजारों महिलाओं की मौजूदगी से सराबोर हो गया. कलाई पर रंग-बिरंगे रक्षासूत्र, आंखों में अपनापन और चेहरे पर खुशी की चमक लिए पहुंचीं इन बहनों ने पूर्व मंत्री राज किशोर सिंह और उनके भाई बृजकिशोर सिंह की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की.
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मुस्लिम महिलाओं ने भी बांधी राखी
इस आयोजन की सबसे खास और अनोखी बात यह रही कि इसमें केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में मुस्लिम समाज की बहनों ने भी पूरे अकीदत व उत्साह के साथ पूर्व मंत्री की कलाई पर राखी बांधी. इस दृश्य ने क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द की एक नई और अमर मिसाल पेश की. राखी बंधवाने के बाद पूर्व मंत्री ने प्रत्येक बहन के सामने शीश नवाकर उनका आशीर्वाद लिया और उन्हें शगुन के तौर उपहार भेंट किए.
नेपाल भेजा शगुन!
कार्यक्रम उस वक्त और भी भावुक हो गया जब बहनों ने शगुन में मिले पैसों को निजी प्रयोग में न लाकर एक मिसाल कायम की. बहनों ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए शगुन की पूरी राशि को नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक त्रासदी के पीड़ितों की मदद हेतु दान में दे दिया. बहनों के इस सेवाभाव से अभिभूत होकर पूर्व मंत्री राज किशोर सिंह, उनके परिजनों और बड़ी संख्या में मौजूद समर्थकों ने भी स्वेच्छा से अपनी तरफ से एक बड़ी राहत राशि (डोनेशन) एकत्र कर नेपाल राहत कोष के लिए भेजी.
‘राजनीति और मजहब के मतभेद बेमानी’
राजकिशोर सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि हर्रैया का यह रक्षाबंधन आयोजन केवल एक राजनीतिक हस्ती का कार्यक्रम नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक बन चुका है. कलाई पर सजी राखी और दिल में एक-दूसरे के प्रति सम्मान का जो भाव यहां देखने को मिला, उसने साबित कर दिया कि जब बात अपनों और इंसानियत की आती है, तो राजनीति और मजहब के तमाम मतभेद अपने आप बेमानी हो जाते हैं.
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