हिजाब पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा की प्रतिक्रिया सामने आई है, मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिजाब को लेकर जो टिप्पणी की है, उसे देखते हुए मुझे लगता है कि अदालत के सामने हिजाब के धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों को जिस मजबूती और स्पष्टता से रखा जाना चाहिए था, शायद उस तरह से नहीं रखा जा सका.
मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि, “हमें यह समझना चाहिए कि इस्लाम में पर्दा और हिजाब केवल पहनावे या सामाजिक परंपरा का हिस्सा नहीं है, बल्कि मुस्लिम महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक आदेश है. इसलिए किसी मुस्लिम महिला के लिए हिजाब केवल कपड़े पहनने का मामला नहीं, बल्कि उसके धर्म और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है.”
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‘हिजाब पर अमल करने की आज़ादी न मिले, तो यह अन्याय’
उन्होंने कहा कि, हम हमेशा चाहते हैं कि मुस्लिम बेटियां अच्छी शिक्षा हासिल करें, आगे बढ़ें, अपने पैरों पर खड़ी हों और देश व समाज की तरक्की में अपना योगदान दें. लेकिन अगर उन्हें शिक्षा और आगे बढ़ने का अधिकार दिया जाए और दूसरी तरफ़ उन्हें अपने धर्म और हिजाब पर अमल करने की आज़ादी न मिले, तो यह उनके साथ अन्याय होगा.
‘शिक्षा और हिजाब एक-दूसरे के विरोधी नहीं’
मौलाना ने कहा कि, हमारी बेटियां शिक्षा भी हासिल कर सकती हैं और अपने धार्मिक नियमों का पालन भी कर सकती हैं. शिक्षा और हिजाब एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. किसी महिला की योग्यता, समझदारी और मेहनत का फैसला उसके कपड़ों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि, हम अदालतों का पूरा सम्मान करते हैं और न्यायपालिका पर हमारा भरोसा है. इसी भरोसे के साथ हमारी अपील है कि इस मामले पर गंभीरता से दोबारा विचार किया जाए. मुस्लिम महिलाओं के धार्मिक अधिकार, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर मामले पर पुनर्विचार होना चाहिए.
अपने धर्म का पालन करने की मिलनी चाहिये आजादी
मौलाना ने कहा कि, हमारा उद्देश्य किसी अदालत या संस्था का अपमान करना नहीं है. हमारा सिर्फ इतना कहना है कि लोकतांत्रिक देश में हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी मिलनी चाहिए. मुस्लिम महिलाओं को हिजाब के साथ शिक्षा हासिल करने और आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए.
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